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मां दुर्गा का द्वितीय स्वरूप ब्रह्मचारिणी


भगवती माँ दुर्गा की नव शक्तियों का दूसरा स्वरुप ब्रह्मचारिणी का है ! यंहा 'ब्रह्म ' शब्द का अर्थ तपस्या है ! ब्रह्मचारिणी - तप का आचरण करने वाली - वेदस्तत्वं तपो ब्रह्म - वेद, तत्व और तप ' ब्रह्म शब्द के अर्थ है ! ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरुप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यंत भव्य है ! इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बाएं हाथ में कमण्डलु रहता है ! अपने पूर्वजन्म में ये जब हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न हुई थी तब नारद के उपदेश से इन्होने भगवान् शंकर जी को पति - रूप में प्राप्त करने के लिए अत्यंत कठिन तपस्या की थी ! इस दुस्कर तपस्या के कारण यह तपश्चारिणी अर्थात ब्रह्मचारिणी नाम से पूजित हुई !

एक हज़ार वर्ष तक उन्होंने केवल फल मूल खाकर व्यतीत किये थे ! सौ वर्षो तक केवल शाक पर निर्वाह किया था ! कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखते हुए खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के भयानक कष्ट सहे ! इस कठिन तपस्या के पश्चात् तीन हज़ार वर्षों तक केवल जमीन पर टूटकर गिरे हुए बेलपत्रो को खाकर वह भगवान् शंकर की आराधना करती रही ! इसके बाद उन्होंने सूखे बेलपत्रो को भी खाना छोड़ दिया ! कई हज़ार वर्षो तक वह निर्जल और निराहार तपस्या करती रही ! पत्तों को खाना छोड़ने के कारण उनका एक नाम अपर्णा भी पड़ गया ! कई हज़ार वर्षो की इस कठिन तपस्या के कारण ब्रह्मचारिणी देवी का वह पूर्वजन्म का शरीर एक दम क्षीण हो गया ! उनकी यह दश देखकर उनकी माँ मैना अत्यंत दुखी हो उठी ! उन्होंने उस कठिन तपस्या से विरत करने के लिए आवाज दी - उमा नहीं , अब नहीं ! तब से देवी ब्रह्मचारिणी का नाम उमा भी पड़ गया !

उनकी इस तपस्या से तीनो लोको में हाहाकार मच गया ! देवता , ऋषि , मुनि , सिद्ध्गन सभी ब्रह्मचारिणी देवी की इस तपस्या को अभूत पूर्व पुन्यकृत बताते हुए उनकी सराहना तथा गुणगान करने लगे ! अंत में पितामह ब्रह्मा जी ने आकाशवाणी के द्वारा उन्हें संबोधित करते हुए प्रसन्न स्वरों में कहा - हे देवी आज तक किसी ने ऐसी कठोर तपस्या नहीं की थी ! ऐसी तपस्या तुम्ही से संभव थी ! तुम्हारे इस अलौकिक कृत्य की चारों दिशाओं में जय जयकार हो रही है ! तुम्हारी मनोकामना अवश्य ही पूर्ण होगी ! भगवान् शिव जी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे ! अब तुम अपनी तपस्या से विरत होकर घर लौट जाओ ! शीघ्र ही तुम्हारे पिता तुम्हे बुलाने आ रहे हैं ! माँ दुर्गा जी का यह दूसरा स्वरुप भक्तों और सिद्धों को अनंत फल देने वाला है !

इनकी पूजा - उपासना से मनुष्य में तप , त्याग , वैराग्य , सदाचार , संयम , पर उपकार की वृद्धि होती हैं ! जीवन के कठिन समय में भी विचलित नहीं होते ! माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्ध और विजय की प्राप्ति होती हैं ! माँ भगवती देवी ब्रह्मचारिणी माता के श्री चरणों में सत सत नमन !

ध्यान:-

वन्दे वांच्छितलाभायचन्द्रर्घकृतशेखराम्।
जपमालाकमण्डलुधराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णास्वाधिष्ठानास्थितांद्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
धवल परिधानांब्रह्मरूपांपुष्पालंकारभूषिताम्॥
पद्मवंदनापल्लवाराधराकातंकपोलांपीन पयोधराम्।
कमनीयांलावण्यांस्मेरमुखीनिम्न नाभि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र:-

तपश्चारिणीत्वंहितापत्रयनिवारिणीम्।
ब्रह्मरूपधराब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
नवचक्रभेदनी त्वंहिनवऐश्वर्यप्रदायनीम्।
धनदासुखदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शंकरप्रियात्वंहिभुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदामानदा,ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्।

कवच:-

त्रिपुरा में हृदयेपातुललाटेपातुशंकरभामिनी।
अर्पणासदापातुनेत्रोअर्धरोचकपोलो॥
पंचदशीकण्ठेपातुमध्यदेशेपातुमहेश्वरी॥
षोडशीसदापातुनाभोगृहोचपादयो।
अंग प्रत्यंग सतत पातुब्रह्मचारिणी॥

भगवती दुर्गाचंद्रघण्टा का ध्यान, स्तोत्र और कवच का पाठ करने से मणिपुर चक्र जाग्रत हो जाता है। जिससे सांसारिक परेशानियों से मुक्ति मिल जाती है।

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